Saturday, 12 September 2015

बीच राह पर

बीच राह पर दंगल होने लगे है ।
शहर के लोग आपा खोने लगे है ।
कोई लुट जाता कोई पिट जाता ,
कानून के रखवाले सोने लगे है ।
झुलझता दामन नये फूलों के संग ,
क्या अंगारों की फसलें बोने लगे है ।
शहर बह जायेगा जालिम तेरा भी ,
मासूम लोग आँख भिगोने लगे है ।
लुटा घरौंदा मुफलिसी में आज फिर ,
जय बिखरे फूलों को पिरोने लगे है ।।
"जय कुमार"9/08/15

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