Saturday, 12 September 2015

"आरक्षण"


एक पौधा कुछ विशेष जाति वर्णो के लोगों के लिए लगाया गया । कहा गया कुछ बर्षो में फल लेकर समाप्त कर देंगे । यह पौधा अपनी साखायें बढ़ाता रहा । खाद पानी भरपूर दिया गया जड़े मजबूत होती रहीं जमीन पर पकड़ बनाकर , इसका स्वरुप निरंतर बड़ता चला गया । एक विशाल वृक्ष बन फलने फूलने लगा । फल बहुत मीठे हुए एवं कम योग्यता कम प्रयास से मिलने लगे । यह फल केवल वो पा सकते थे जिनके लिए यह वृक्ष लगाया गया था । इसकी छाँव में रहने वाले वर्ण के कुछ योग्य लोग जिनने भरपूर दोहन कर इस वृक्ष के फलों का उपयोग किया एवं समृध्द होते चले गये । उनके अन्य साथियों को कम ही लाभ हुआ । फिर समृध्द लोग वृक्ष के मीठे फलों को छोड़कर जाने को तैयार नही हुए ।
जिन्हे इसके नीचे नही रखा गया वो इसके मीठे फलों को देख इस वृक्ष की छाँव में आने को आतुर हुए एवं संघर्ष करने लगे ।
वृक्ष के नियम नियंत्रण रखने वाली संस्थायें एवं लोग अपने स्वार्थ बस इसका स्वरुप बढ़ाते रहे । संघर्ष होते रहे स्वरुप बढ़ता गया । अब यह वृक्ष जमीन लीलते हुए अपने स्वरुप को बड़ाता रहता है । समृध्द हो चुके लोग सरलता से मिलने वाले मीठे फलों को छोड़ने को तैयार नहीँ है । कुछ इसकी छाँव पाने के लिए संघर्ष कर रहे है , जिनमें कुछ पिछड़े तो कुछ समृध्द सामिल है । नियंत्रक निजी स्वार्थ बस कुछ निर्णय लेने की स्थिति में कभी नहीँ दिखे ।
जमीन जो सर्वोपरि है उसकी चिंता किसी को नहीं , निजी स्वार्थ के लिए यह वृक्ष आज तक जीवित है । इसके मीठे फल , जमीन को विघटित समाज में जहर घोलने लगे है ।
जमीन को लीलता जा रहा यह वृक्ष , क्या खत्म नहीं होना चाहिए ?
क्या इस वृक्ष के नियम आधार अब भी नहीं बदलने चाहिए ?
क्या आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं होना चाहिए ?

"जय कुमार"

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