Monday, 12 May 2014

चकमक की

चकमक की
चिंगारी पल भर
में खत्म होती

प्रकाश देती
जग जन जीव को
एक चिंगारी

अहसासों के
दृढ़ता से भरे भावों
का प्रकाश वो

अहं मद को
निर्मूल कर जाता
लोभ मुक्त वो

वो अहसास
जीवित रहा सदा
स्वप्न रहा जो

दृष्टि पटल
पाया ना कभी मैंने
मन में बैठा

सिंचित किया
जीवन की बगिया
उन्ही पलों ने

रोशन कर
जर्रा जर्रा नूर वो
मन की आशा

"जय कुमार" 10/05/14

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