Sunday, 25 May 2014

तमाम उम्र देखा

तमाम उम्र देखा
जिसे दर्पण में
हर पल बदलता 
बो दर्पण मुझे
कुछ सन्देश देता 
नियति से सरोकार
कराना चाहता
हर दिन मुझे
चेतावनी देता
बहुत कहना चाहता
झुर्रियों को स्पष्ट
दिखाता हर बार
पहला स्वेत केश
उसी ने दिखाकर
प्रयास किया फिर
केश फूले काँसकी
तरह दिखाये
मांस सिकुड़ता
झुर्रियां बिखर गई
वह सम्हलने का
सन्देश देता रहा
लेकिन मैंने
एक ना सुनी
वह दिन आया
दर्पण सामने था
मैं कुछ देख
ना पाया


"जय कुमार " २५ /०५ /१४




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