चाँद की चाँदनी , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।
फूलों की खुश्बु , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।
कुछ सोचने समझने का बक्त कहाँ था तेरे सिवाय ,
जमाने की अदायें , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।।
"जय कुभार" 01/05/14
फूलों की खुश्बु , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।
कुछ सोचने समझने का बक्त कहाँ था तेरे सिवाय ,
जमाने की अदायें , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।।
"जय कुभार" 01/05/14
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