Thursday, 19 June 2014

दिल करता मेरा

दिल करता मेरा
तोड़ दूँ बँधन मैं भी
उड़ जाऊँ
मुक्त गगन में
बँधी हूँ
जकड़ी हूँ
रीतिओं से
रिवाजों से
मुझपर पाबंदियाँ
उसपर क्यों नहीं
मैं स्वतंत्र नहीं
घर में
समाज मुझपर नजरें
गड़ाये रहता क्यों
उसी माँ ने
मुझे जना
उसी ने उसको
भेदभाव कैंसा है
मैं खुद को
अभिव्यक्त ना
कर सकुँ
मेरा गुनाह क्या
उसने
मानव जाति बनाई
भेद क्यों बनाया
कमजोर कहते मुझे
अगर हूँ
तो कमजोर
क्यों बनाया
नहीं हूँ तो समाज
क्यों जकड़ता
मेरी सिसक
का गुनहगार कौन
ईश्ळर
समाज
या मैं खुद

"जय कुमार" १४ /०६ /१४

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