दिल करता मेरा
तोड़ दूँ बँधन मैं भी
उड़ जाऊँ
मुक्त गगन में
बँधी हूँ
जकड़ी हूँ
रीतिओं से
रिवाजों से
मुझपर पाबंदियाँ
उसपर क्यों नहीं
मैं स्वतंत्र नहीं
घर में
समाज मुझपर नजरें
गड़ाये रहता क्यों
उसी माँ ने
मुझे जना
उसी ने उसको
भेदभाव कैंसा है
मैं खुद को
अभिव्यक्त ना
कर सकुँ
मेरा गुनाह क्या
उसने
मानव जाति बनाई
भेद क्यों बनाया
कमजोर कहते मुझे
अगर हूँ
तो कमजोर
क्यों बनाया
नहीं हूँ तो समाज
क्यों जकड़ता
मेरी सिसक
का गुनहगार कौन
ईश्ळर
समाज
या मैं खुद
"जय कुमार" १४ /०६ /१४
तोड़ दूँ बँधन मैं भी
उड़ जाऊँ
मुक्त गगन में
बँधी हूँ
जकड़ी हूँ
रीतिओं से
रिवाजों से
मुझपर पाबंदियाँ
उसपर क्यों नहीं
मैं स्वतंत्र नहीं
घर में
समाज मुझपर नजरें
गड़ाये रहता क्यों
उसी माँ ने
मुझे जना
उसी ने उसको
भेदभाव कैंसा है
मैं खुद को
अभिव्यक्त ना
कर सकुँ
मेरा गुनाह क्या
उसने
मानव जाति बनाई
भेद क्यों बनाया
कमजोर कहते मुझे
अगर हूँ
तो कमजोर
क्यों बनाया
नहीं हूँ तो समाज
क्यों जकड़ता
मेरी सिसक
का गुनहगार कौन
ईश्ळर
समाज
या मैं खुद
"जय कुमार" १४ /०६ /१४
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