Thursday, 19 June 2014

कब्र पर आकर

कब्र पर आकर अब क्यों आँसु बहाते हो ।
जख्मों को कुरेदकर क्यों लहु बहाते हो ।
साँसे चलती रही तब तक सुकून ना मिला ,
अब मेरी मुहब्बत के क्यों किस्से सुनाते हो ।

उस वक्त कहाँ थे जब भटका शहरों में ।
उस वक्त कहाँ थे जिये हिज्र के कहरों में ।
तड़पा के मारा और अफसोस जताते हो ,
उस वक्त कहाँ थे जब टूटते थे पहरों में ।

बेवफाई के बहुत ही बड़े बाजीगर हो तुम ।
अफसानो को लीलने वाले अजगर हो तुम ।
अब क्यों मेरी खाक को यूँ नापाक करते हो ,
मुहब्बत कफन के बहुत बड़े सौदागर हो तुम ।

चले जाओ अपने आप को खोने दो मुझको ।
चले जाओ अपने प्यार पर रोने दो मुझको ।
एहसान कर अरसे के बाद सुकून मिला है ,
चले जाओ मेरे सामने से सोने दो मुझको ।

"जय कुमार" 19/06/14

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