Thursday, 19 June 2014

का जमानों

का जमानों आ गओ भैया ,
अब कोनऊ शर्म ना आत है ।
का जमानोँ आ गओ भैया ,
बेईमान हलुआ पुड़ी खात है . . .

बाप मतारी खौं भूल गये ।
रीत रिवाज खौं भूल गये ।
मोड़ा बऊयों से सबके सामु ,
हँस हँसकर के बुलयात है . .

भूल गयों राम की बतियां ।
भूल गयो काम की बतियां ।
शहर के सड़क किनारे भैया ,
अब तो ईल्लु ईल्लु गात है ।

नीति अनीति बिसरा दई ।
कुरीति रीति खूब चला दई ।
लंगड़ा राजा दोड़ लगा रये ,
न्याय कुर्सी पे अंधों बैठ जात है . .

विकास नीतिया खूबई अच्छी ।
उनकी बतियां खूबई सच्ची ।
दोनई जोर हम पथरा पटकें ,
गरीब भैया नोनई रोटी खात है . .

मोरी कमाई मँहगाई खा गई ।
नेतन की बाँते उल्लु बना गई ।
इते कमाबे उते झट से जाबे ,
भँजी जेरिया पड़ा जबात है . .

गले मिलत ते ईद पे हम ।
बाँटे मिठाई दिवारी पे हम ।
जै सियासी चाले चलत रहे ,
हम मजहब पे लड़ जात है . . .

"जय कुमार"15/06/14

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