Friday, 27 June 2014

"हाइकु"

प्रतिकार में
स्वीकार हो क्या तब
प्रेम है यही

डाँट माँ की
शिक्षक की फट्कार
प्रेम ग्रसित

अपनत्व में
कड़क होना होता
भाव भला है

निर्विकार जो
प्रेम करता वही
सिर्फ सोचता

भौंरे का फूल
लगाव होता सदाँ
विकार युक्त

जड़ का पौधा
प्रेम निर्विकार है
जीवन देता

माँ का पुत्र को
दूध निर्मल भाव
ना कोई आस

"जय कुमार" 25/06/14

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