Sunday, 8 June 2014

gazal

ख्वायिशों के पर निकलने लगे ।
बच्चे अब पैरों पर चलने लगे ।

वक्त ने रुख बदला कुछ ऐसा ,
दुश्मन भी अब गले मिलने लगे ।

सियासत के पाँसे बदल गये अब ,
आशा के फिर पुष्प खिलने लगे ।

रोटी मिलने की आशा कैंसे करें ,
जब पौधों में बिष मिलने लगे ।

गुमनाम हो जाते है यहाँ वो शहर ,
हवा में जिनके जहर घुलने लगें ।

परिंद्रों के घर पर कहर ढाते वो ,
जिनकी रगों में रोग पनपने लगे ।

मुसीबत भी आसान लगती उनको ,
जो अपने आप में ही रहने लगे ।

"जय कुमार" 30/05/14

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