Sunday, 17 May 2015

साथ हो तेरा

किसी राह में मेरा भी ,,, इक घर हो !
साथ हो तेरा खूबसूरत,,, सफर हो !!

मुकम्मल हो कैंसे ,,,,, दुनिया हमारी ,
परिन्द्रो को जब सैय्याद का डर हो !

जालिमों ने लूटा हो ,,, दाना पेट का ,
सिर पर हो आसमां,, कैंसे बसर हो !

जर्रे जर्रे में रब का ,,, नूर दिखता है ,
इंसां गर तेरी ,,,,,,,,,,,, पाक नजर हो !

खुदगर्जी की आग में झुलझता रहा ,
इस जहां में भी इक ,,,, प्रेम नगर हो !

भरोसा किस पे करें  ,खुदगर्ज जहां ,
राज छुपाये रखो,, राजदाँ अगर हो !

जय चल सके सुकूं से ईमान कि राह ,
जमाने में बता गर ,,,,,,कोई डगर हो !!

"जय कुमार"23/04/15

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