Tuesday, 26 May 2015

मेरी बस्ती में


मेरी बस्ती में ना आया करो ,
यह ख्वाबों से सजाई गई है ।
जतन से सँभारा मैने तन को ,
हस्ती मिट्रटी में दबाई गई है ।
हाड़ माँस का पुतला बना हूँ ,
इंसाँ बना इज्जत बाढ़ाई गई है ।
चेहरे पर चमक चार दिन की ,
वक्त की चाल चलाई गई है ।
जिंदगी चंद पलों का खेल है ,
आयु की लगाम लगाई गई है ।
"जय कुमार"14/05/15

No comments:

Post a Comment