पापी पेट के खातिर पाप करते ,
जमाना गिरी नजरों से देखता है ।
दो निवाले न दे सका जो समाज ,
भरी सभाओं में बैठकर टोकता है ।
जमाना गिरी नजरों से देखता है ।
दो निवाले न दे सका जो समाज ,
भरी सभाओं में बैठकर टोकता है ।
दीवाना जो घूमते मेरी गलियों में ,
भरे बाजार में मुझे ही रोकता है ।
राज को राज रहने दो राजदार हम ,
सारा राज हमारे कोठों पे खुलता है ।
बेशर्म कहते फिरते हमें जो लोग ,
दर पे हमारे इज्जत से वो मिलता है । ।
"जय कुमार"20/04/15
भरे बाजार में मुझे ही रोकता है ।
राज को राज रहने दो राजदार हम ,
सारा राज हमारे कोठों पे खुलता है ।
बेशर्म कहते फिरते हमें जो लोग ,
दर पे हमारे इज्जत से वो मिलता है । ।
"जय कुमार"20/04/15
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