Tuesday, 26 May 2015

दर्द भरा फसाना था ।



इक परिन्द्रे का दर्द भरा फसाना था ।
दरख्त की टहनियाँ इक ठिकाना था ।
तेज तूफाँ था बिजली संग बारिष भी ,
बच्चे थे छोटे घौंसला भी पुराना था ।।
सूखता था कंठ गीत गुनगुनाना था ।
पत्थरों बीच आसियाना बनाना था ।
कंधे झुक चुके वक्त की मार में यारों ,
जिम्मेदारियों का बोझ तो उठाना था ।।
कट चुके पंख घर पर ना खाना था ।
सैय्याद की नजर बेदर्द जमाना था ।
अपने कुल को बचाने के खातिर उसे ,
घनघोर तम दूर तलक उड़ जाना था ।।


"जय कुमार"29/04/15

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