Sunday, 17 May 2015

रिश्तों के भँवर

रिश्तों के भँवर में फँसते रहे हम।
भावों कि चक्की में पिस्ते रहे हम ।
बेशर्म बददिमाग कीमत लगाते ,
बेमोल बाजार में बिकते रहे हम ।
प्रेम की अगन दिल में दबी रही ,
ठंडे मौसमों में भी जलते रहे हम ।
तूफान अपनी जवानी दिखाता रहा
चिराग जिन्दगी के जलाते रहे हम ।
"जय कुमार" ,11/04/15

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