आग जल उठी अंगारे बिखर रहे ।
पानी नसीब न प्यासे अधर रहे ।
लुट रहा भावनाओं का काफिला ,
अँधेरी रात लुटेरों पर नजर रहे ।
पानी नसीब न प्यासे अधर रहे ।
लुट रहा भावनाओं का काफिला ,
अँधेरी रात लुटेरों पर नजर रहे ।
बीत चुकी रात राह देखते रहते ,
रोज के राहगीर बता किधर रहे ।
टूट चुकी मोतिओं की माल फिरसे ,
रेशम के धागों के कहाँ बसर रहे ।
रुह तक लूट चुके वो मेरी प्रेम में ,
मिटा आस्तित्व कैसे सबर रहे ।
जमाने से मिलते रहे हम रोज रोज ,
अपने आपसे मिले हम खबर रहे ।
नये जमाने नये खून कि ये दास्ताँ ,
बुजुर्गो के कहाँ जय अब असर रहे ।।
"जय कुमार"10/4/15
रोज के राहगीर बता किधर रहे ।
टूट चुकी मोतिओं की माल फिरसे ,
रेशम के धागों के कहाँ बसर रहे ।
रुह तक लूट चुके वो मेरी प्रेम में ,
मिटा आस्तित्व कैसे सबर रहे ।
जमाने से मिलते रहे हम रोज रोज ,
अपने आपसे मिले हम खबर रहे ।
नये जमाने नये खून कि ये दास्ताँ ,
बुजुर्गो के कहाँ जय अब असर रहे ।।
"जय कुमार"10/4/15
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