Sunday, 17 May 2015

रिश्तों में अब

रिश्तों में अब व्यापार हो गया ।
परिवार अब बाजार हो गया ।
जब मिलते चार यार साथ में,
हुड़दंग अब त्यौहार हो गया ।
खून के अश्क बहाहे लिखने में ,
प्रेम का खत अखवार हो गया ।
ईमान कि कसमें खाकर इंसाँ ,
बिकने को अब तैयार हो गया ।
कुदरत की घुट रही साँसें अब ,
शहरों का ऐसा निखार हो गया ।
मुँह में मिसरी दिल में जहर है ,
आदमी का यह व्योहार हो गया ।
वासनाओं का खेल खेलते रोज ,
भैया लड़के को प्यार हो गया ।
दुनिया का अजीब चलन देख ,
जय आज फिर बीमार हो गया ।।
"जय कुमार"24/04/15

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