तेरी वेवफाई का सितम दूर तलक झेलता रहा ।
मेरे साथ समय यूँ ही बेरहम खेल खेलता रहा ।
मेरे साथ समय यूँ ही बेरहम खेल खेलता रहा ।
सजी महफिलों में मगरुर हो पैमाने झलकते रहे ,
खूबसूरत नजारों के बीच वो शख्स अकेला रहा ।
खूबसूरत नजारों के बीच वो शख्स अकेला रहा ।
तस्वीर सीने से लगा सूरत दिल में बसाई रखी ,
दिल के जज्वातों को रेत पे हर वक्त उकेरता रहा ।
दिल के जज्वातों को रेत पे हर वक्त उकेरता रहा ।
मंजूर ए मुहब्बत कि खातिर मगरुर जमाने में ,
कोई दीवाना फिर बुतों के सामने बोलता रहा ।
कोई दीवाना फिर बुतों के सामने बोलता रहा ।
मुकम्मल जहां की चाह मगरुर दिल कि लेकर ,
लहू को अश्क बना जज्बे को यूँ बिखेरता रहा ।
लहू को अश्क बना जज्बे को यूँ बिखेरता रहा ।
बज्म में बैठकर हँसना बन गया था जिनका पैसा ,
जय बेदर्द जमाने में राज -ए- दिल खोलता रहा ।
जय बेदर्द जमाने में राज -ए- दिल खोलता रहा ।
"जय कुमार"28/4/15
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