Friday, 18 April 2014

मेरा अक्स

मेरा अक्स ही अब डरा जाता है मुझको
गहरे घावों पर नमकीन पानी की बूँदें
नजरों का तीखापन सहमा जाता है मुझको
मेरे कोमल मन को पढ़ना ना जानते तुम
पँखुड़ियों को मरोड़ना डरा जाता है मुझको
साँसे भारी हो गईं खौफनाक दर्द के साये में
मेरी उम्मीदों के जुगनु रुला जाते है मुझको
आसमान पर बिजलियाँ धरती पर कहर
भरम टूटा हुआ अब सहमा जाता है मुझको
किसी वक्त चहककर चारो ओर चलती रही
टूटे रिश्तों के धागे अब हरा जाते है मुझको
कस्ती की पतवार रही थी सदियों में
कस्ती के छेद अब डुबो ले जाते है मुझको
परिंदो की भाँति स्वतंत्र रहने का ख्याल
शिकारियों के जाल फँसा ले जाते है मुझको
मौसमी फूल की तरह खिलना था जिसे
आग के दरिया अब बहा ले जाते है मुझको
ख्लाल बदल गये जिंदगी के शायद मेरे
भावनाओं के समुंदर डुबा ले जाते है मुझको

"जय कुमार" 18/04/14

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