यूँ ना चलो बन ठन के , जमाना खराब है ।
बहक जायेंगे मँजनु , ये हुस्ने शबाब है ।
शहर नये दौर का रंगीनिया चड़ी है खूब ,
हुस्न से जाम का मिलन , होता खराब है ।
तेरी नजरों की कटारों से कयामत आयी है ,
लुट गये जान से जमाने , ये हुस्ने शबाब है ।
खैर बस उन्ही की जो नजरें झुका ले तुझसे ,
तेरे साथ की चाहत , होता अंजाम खराब है ।
मयखाने गया मैं कोई भेद नजर ना आया ,
'जय' सबका मजहब सिर्फ , जामे शराब है ।
"जय कुमार" 21/04/14
बहक जायेंगे मँजनु , ये हुस्ने शबाब है ।
शहर नये दौर का रंगीनिया चड़ी है खूब ,
हुस्न से जाम का मिलन , होता खराब है ।
तेरी नजरों की कटारों से कयामत आयी है ,
लुट गये जान से जमाने , ये हुस्ने शबाब है ।
खैर बस उन्ही की जो नजरें झुका ले तुझसे ,
तेरे साथ की चाहत , होता अंजाम खराब है ।
मयखाने गया मैं कोई भेद नजर ना आया ,
'जय' सबका मजहब सिर्फ , जामे शराब है ।
"जय कुमार" 21/04/14
No comments:
Post a Comment