Friday, 25 April 2014

जहाँ तक नजरे

जहाँ तक नजरे जाती ,
बस इंसा नजर आता है ।
जहाँ तक जमीं फैली ,
बस इंसा नजर आता है ।
चारो तरफ इंसा अपनी ,
बस विरासत चलाता है ।
धरती के आखरी तक ,
बस इंसा नजर आता है ।
इस इंसा की कहानी भी ,
बस इंसा ही सुनाता है ।
सदियों की विरासत को ,
बस इंसा ही चलाता है ।
पूर्वजो के अनुभवों से ये ,
नये मार्गो पर चलता है ।
चलना इसका कर्म एक ,
बस चलता ही जाता है ।

"जय कुभार" 25/04/14

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