Monday, 21 April 2014

जिस दिन से यार

जिस दिन से यार तुम रुठ गये ,
मैंने हँसना छोड़ दिया ।
जिस दिन से दिल मेरा टूट गया ,
मैंने जीना छोड़ दिया ।

बहारे आतीं मौसम बदलता है ।
ख्वावो का टूटा अरमां पलता है ।
जिस दिन से मेरा रब रुठ गया ,
मैंने दर पर जाना छोड़ दिया ।

होती रही हँसाई मेरी चारो ओर ।
अंधेरा घनेरा ना दिखी मुझे भोर ।
जिस दिन से शहर की भीड़ मेँ गुम हुआ ,
मैंने घर से निकलना छोड़ दिया ।

हसरतों का दर्द जाता कभी नहीं ।
उनका नाम लबों पर आता कभी नहीं ।
जिस दिन से जाम से यारी हुई ,
मैंने महफिल में जाना छोड़ दिया ।

नम आँखों की किसी ने ना सुनी ।
झुकी पलकों की भी एक ना सुनी ।
जिस दिन से खाये नजरों के धोके ,
आँखों ने रोना छोड़ दिया ।

"जय कुमार" 21/04/14

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