Monday, 21 April 2014

दूसरों को काँटे बिछाये ,

दूसरों को काँटे बिछाये ,
फूलों की आशा कैंसी ।
दूसरों को कड़वा कहते ,
तुमें मृदुल भाषा कैंसी ।
करते हो व्यवहार वही
लौटकर आता है यारो ,
दूसरों को जहर दिया ,
अमृत की आशा कैंसी ।

जड़ें खोदते रहे हो सदा ,
फलों की आशा कैंसी ।
आग उगलते रहे हो सदा ,
नीर की आशा कैंसी ।
जो किया वही मिलता
बबूल पर काँटे खिलते ,
दूसरों से जलते रहे सदा ,
प्रेम की आशा कैंसी । ।

दूसरों के दुख पर हँसे ,
सहानुभूति की आशा कैंसी ।
राह में पत्थर बिछाये ,
अब पुष्पों की आशा कैंसी ।
उम्मीद वही करो जो
हमने किया किसी के साथ ,
भूखे को भोजन ना दिया ,
अब रहम की आशा कैंसी ।

"जय कुमार" 20/04/14

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