Monday, 7 April 2014

राई का पहाड़

राई का पहाड़ बनते देखा ।
विद्धानों को उवलते देखा ।
ईमान को हाथ जोड़ते देखा ।
वेईमान को ऐंड़ते देखा ।

हंस को दाना चुनते देखा ।
अमीर को तंगहाल होते देखा ।
अरमानों को मचलते देखा ।
ख्वावो को कुचलते देखा ।

आँसुओं में प्यार पलते देखा ।
किसी की कमी खलते देखा ।
आज में भी कल आते देखा ।
कल में भी आज जाते देखा ।

मजबूरी में इंसां बिकते देखा ।
गरीब को नीँद सोते देखा ।
धनी चिँता में जागते देखा ।
यहाँ जहर बीज बोते देखा ।

मुहब्बत को सदा रोते देखा
खून के रिश्तों को टूटते देखा ।
यहाँ भरोसा को लुटते देखा ।
लालच को हाथ मलते देखा ।

मौत के बाद मौत होते देखा ।
बुढ़ापे में बचपन खेलते देखा ।
जवानी मेँ मगरुर होते देखा ।
अहं की आग में डूबते देखा ।

नमन उगते को होते देखा ।
शेर को शियार होते देखा ।
प्यार को धुत्तकारते देखा ।
दिल मंदिर स्वीकारते देखा ।

तारो को रोज निहारते देखा ।
सूरज को भी डूबते देखा ।
आयु की साँझ आते देखा ।
सिकंदर को भी जाते देखा ।

यीशु को दोबारा आते देखा ।
गूँगे को गीत गाते देखा ।
पँगु को पहाड़ चढ़ते देखा ।
अंधे को सौंदर्य निहारते देखा ।

शूरवीर को रण छोड़ते देखा ।
महावीर को देह त्यागते देखा ।

"जय कुमार" 05/04/14

No comments:

Post a Comment