Friday, 4 April 2014

कब से ठिकाना खोज रहा

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने आप का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैँ अपने आज का ।
कल गया कल फिर आया मैंने कुछ भी ना पाया,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने राज का ।

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने जाल का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ, मैं अपने पाल का ।
आज आया कल जाऊँगा यहाँ से कुछ ना पाऊँगा,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैँ अपने काल का ।

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने नाम का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने काम का ।
क्यों आया कैंसे आया , उत्तर आज तक ना पाया ,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने राम का ।

"जय कुमार" 03/04/2014

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