Tuesday, 5 November 2013

राहेँ वीरान

वो राहेँ वीरान हो गई ,
जहाँ खेलता था जीवन . . .
आँगन भी ना रहा जहाँ , 
खिलखिलाता था बचपन . . 
इस नफरत की आग मेँ ,
कब तक जलोँगे जलाओगे,
एक दीप तो जलाओ प्रेम से, 
फिर चहक उठेगा मधुवन . .
"जय" २५ /१० /२०१३ 

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