रावण बैठा हम सबके मन मेँ ,
भटकाता हमेँ वह जीवन वन मेँ ,
कभी क्रोध बनके फन फैलाता ,
कभी अहं बन मैँ मैँ चिल्लाता ,
कभी लोभ बनके हमेँ नचाता ,
कभी ईष्या बन वो हमेँ छकाता ,
कभी मोह के जाल मेँ फँसाता ,
कभी वासना कीँ जंजीर बिछाता ,
दुष्चक्र की सारी वो राह बताता ,
आडम्बर के वो नित खेल रचाता ,
मन के इस रावण को आज जलायेँ ,
मन के दागोँ को हम आज मिटायेँ ,
कह कह कर जय जय श्रीराम ,
आज करेँ हम सब ये शुभ काम ,
"जय" १४/१०/२०१३
भटकाता हमेँ वह जीवन वन मेँ ,
कभी क्रोध बनके फन फैलाता ,
कभी अहं बन मैँ मैँ चिल्लाता ,
कभी लोभ बनके हमेँ नचाता ,
कभी ईष्या बन वो हमेँ छकाता ,
कभी मोह के जाल मेँ फँसाता ,
कभी वासना कीँ जंजीर बिछाता ,
दुष्चक्र की सारी वो राह बताता ,
आडम्बर के वो नित खेल रचाता ,
मन के इस रावण को आज जलायेँ ,
मन के दागोँ को हम आज मिटायेँ ,
कह कह कर जय जय श्रीराम ,
आज करेँ हम सब ये शुभ काम ,
"जय" १४/१०/२०१३
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