Tuesday, 5 November 2013

मन के रावण

रावण बैठा हम सबके मन मेँ , 
भटकाता हमेँ वह जीवन वन मेँ ,
कभी क्रोध बनके फन फैलाता , 
कभी अहं बन मैँ मैँ चिल्लाता ,         
कभी लोभ बनके हमेँ नचाता , 
कभी ईष्या बन वो हमेँ छकाता , 
कभी मोह के जाल मेँ फँसाता ,              
कभी वासना कीँ जंजीर बिछाता , 
दुष्चक्र की सारी वो राह बताता ,
आडम्बर के वो नित खेल रचाता , 
मन के इस रावण को आज जलायेँ ,
मन के दागोँ को हम आज मिटायेँ ,
कह कह कर जय जय श्रीराम ,
आज करेँ हम सब ये शुभ काम ,
"जय" १४/१०/२०१३ 

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