पानी पानी हो गया ,
साँवन मैँ चारो ओर ।
धरा ने ओढी हरि चुनरिया ,
वन मैँ नाचे मोर ।।
"जय" 21/08/2013
साँवन मैँ चारो ओर ।
धरा ने ओढी हरि चुनरिया ,
वन मैँ नाचे मोर ।।
"जय" 21/08/2013
जोगी तेरे खटकर्म से ,
शर्मिदा है तेरा जोग ।
विठ्ठल्ला की भक्ति मैँ ,
कैसे सीखा तुने भोग ।।
"जय" 22
शर्मिदा है तेरा जोग ।
विठ्ठल्ला की भक्ति मैँ ,
कैसे सीखा तुने भोग ।।
"जय" 22
मोरो जो बुँदेलखण्ड ,
सारी दुनिया से न्यारो ।
लक्ष्मीबाई सी बिटिया ,
जाको छत्रसाल बेटा प्यारो ।।
"जय" 24
सारी दुनिया से न्यारो ।
लक्ष्मीबाई सी बिटिया ,
जाको छत्रसाल बेटा प्यारो ।।
"जय" 24
मेरा मन मुझको ,
टटोलता है ,
मुझसे ही सवाल करता ,
मुझे ही कटघरे मैँ खड़ा करता ,
दोषी सावित करता ,
फैसला देता ,
और मानने मानने पर ,
मजबूर करता । 22
टटोलता है ,
मुझसे ही सवाल करता ,
मुझे ही कटघरे मैँ खड़ा करता ,
दोषी सावित करता ,
फैसला देता ,
और मानने मानने पर ,
मजबूर करता । 22
टूटने की आवाज ,
ना सुनी ,
गिरने की आवाज ,
ना सुनी ,
एक हवा का ,
झोँका होगा ,
शायद ,
पत्ते की उड़ने ,
को महसूस किया बस ।
"जय" सुप्रभात 23
ना सुनी ,
गिरने की आवाज ,
ना सुनी ,
एक हवा का ,
झोँका होगा ,
शायद ,
पत्ते की उड़ने ,
को महसूस किया बस ।
"जय" सुप्रभात 23
रिमझिम बारिष थम गई ,
जब साँवन विदा हो जाय ।
अब भादोँ ने दस्तक दी ,
ज्योँ बर्षा गई बुढ़ाय । ।
"जय" 23
जब साँवन विदा हो जाय ।
अब भादोँ ने दस्तक दी ,
ज्योँ बर्षा गई बुढ़ाय । ।
"जय" 23
मेरी उम्मीद से भी ,
तुम कहीँ ज्यादा निकले ।
हम बेवफा समझते थे ,
तुम तो मेरे कातिल निकले ।।
"जय" शुभरात्रि 23
तुम कहीँ ज्यादा निकले ।
हम बेवफा समझते थे ,
तुम तो मेरे कातिल निकले ।।
"जय" शुभरात्रि 23
कब तक धर्म की आड़ मैँ ,
करते रहोगे काले काम ।
कब तक ईश्वर को बेँचोगे ,
चौराहो पर लेकर दाम ।।
अब बात निकल पड़ी है ,
आस्था से निकला है नाग ,
तेरे विश्वास की दौलत को ,
कुछ करते है अब बदनाम. .
राम रहीम का धंधा करते ,
दाम काम मैँ वो है भरते ,
तू डरता इनके पखंडो से ,
यहाँ तेरी मेहनत तेरा दाम. . . .
"जय" 30
करते रहोगे काले काम ।
कब तक ईश्वर को बेँचोगे ,
चौराहो पर लेकर दाम ।।
अब बात निकल पड़ी है ,
आस्था से निकला है नाग ,
तेरे विश्वास की दौलत को ,
कुछ करते है अब बदनाम. .
राम रहीम का धंधा करते ,
दाम काम मैँ वो है भरते ,
तू डरता इनके पखंडो से ,
यहाँ तेरी मेहनत तेरा दाम. . . .
"जय" 30
प्रेम की खुशबु कोदूरियाँ ,
कब कम कर पाई है।
साथ रहकर भी दूर लगते ,
किसी ने दूर से मँजिल पाई है ।।
"जय" शुभरात्रि सम्मानीय मित्रो 31
कब कम कर पाई है।
साथ रहकर भी दूर लगते ,
किसी ने दूर से मँजिल पाई है ।।
"जय" शुभरात्रि सम्मानीय मित्रो 31
जीवन उन राहो का नाम ,
जिनमे संघर्ष अपार।
कुछ ऐसा कर गुजरेँ ,
जो हो जीवन के पार ।।
"जय 31
जिनमे संघर्ष अपार।
कुछ ऐसा कर गुजरेँ ,
जो हो जीवन के पार ।।
"जय 31
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