Saturday, 9 November 2013

सरकारी बाबु

एक दिन की बात
दो बाबुओँ की मुलाकात
आपस मेँ हाय हेलो हुई
फिर विभागो की गोपनीय बात हुई
नफा नुकसान की बराबर जाँच हुई
अपने अपने दुखड़े सुनाने लगे
एक दूसरे को बनाने लगे
बातोँ बातोँ मेँ बात खुल गई
उनको एक दूसरे की बात मिल गई
रास्ते से हम जा रहे थे
दुखड़ा किसी को सुना रहे थे
बाबुओँ को देख गुस्सा आया
हमने कहा तुमने फिर हमेँ बनाया
हम कार्यालय मेँ बैठे रहे
तुम दोनोँ यहाँ गपोड़े देते रहे
जरा समय पर गौर कीजिए
थोड़ी सी तो शर्म कीजिए
बो बोले क्योँ पागलोँ की तरह चिल्लाते हो
क्योँ रोड पर शोर मचाते हो
अभी एक ही तो बजा है
तुम चलो हम कार्यालय आते है
हमने कहा साहब हम सुबह से आये है
अपना दुखड़ा सबको सुनाये है
आपकी राह देखते रहे कार्यालय मेँ ,
आप अभी तक नहीँ पधारेँ है
बाते बढ़ती गईँ
समय घटता गया
दो बजे फिर लंच हो गया
और हमारा सपना फिर कहीँ खो गया . . .

 "जय" 8/11/2013

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