Tuesday, 5 November 2013

मेरे भाव

वो कहते है हम निर्दोश है दँगो मैँ , 
अगर भीषण आग न लगी होती , 
तो धुँआ आज तक ना उठता . . . .
"जय"  16/07/13


उनके आँसुओ का सैलाब ,
तेरे शहर को कहीँ बहा ना दे . . .
उनके दिल का घुमड़ता दर्द , 
तेरी हस्ती को कहीँ मिटा ना दे . . . 
मै सोचता हूँ कभी कभी "जय" ,
रब का इँसाफ तेरा नामो निशा मिटा ना दे . . . .
जय कुमार जैन 17

 
ना हिँदु बनाया था उसने , 
ना मुसलमान बनाया था , 
एक संपूर्ण धरा पर तुझे , 
खूबसूरत दिल के साथ , 
बेसकीमती इंसान बनाया था , 
तूने उसको भी बाँट दिया , 
अपनी खुदगरजी मै पड़कर , 
तू क्या बन गया यहाँ , 
उसने तुझे क्या बनाया था . . .
"जय" 17

तेरे दर आ गये अब क्या मँगाये , 
यही तो आखरी ख्वायिश थी मेरी . . . 
'जय'  20

 
हम टूटकर चाहते थे , 
तुम दीवाना कहकर , 
मुजे मजाक बना गये . . . . 
मै इँतजार करता रहा , 
वो किसी की वगिया की , 
शोभा बड़ा गये . . . .
मैँ कभी रोता नही था , 
यादो के झरोखे तेरे , 
मुझको रुला गये . . . . 
समुंदर से भिड़ने चला, 
खाक होकर हम , 
लहरो मैँ समा गये . . . 
"जय"  20

 
हम वक्त को यूँ ही निकालते गये , 
एक दिन ऐसा वक्त आया , 
उसने हमे ही निकाल दिया . . . . .
"जय" 20

 
मन तन धन से पूजियो , 
गुरु ज्ञान की खान । 
जीवन भर उपकार रहे , 
दिया हमेँ जो ज्ञान ।। 
"जय" 22



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