अपने शब्दोँ को इतना कठोर ना कर की ,
वह वाण बन जायेँ ।
अपने को इतना नरम ना करो ,
की वह छुई मुई का पेड़ बन जायेँ . . . . .
आग है तेरे दिल मेँ , मेरे दिल मेँ ,
और उसके दिल मेँ ,
इस आग को योँ ना भड़काओ कि उसमे ,
जलकर राख बन जायेँ . . . .
स्वर बिखरे पड़े हैँ प्रकृति मेँ ,
उन्हे खोजना है ,
उनको योँ जोड़ेँ ,
कि वह राग बन जायेँ . . . . .
मुश्किल लाख सही क्या होता है ,
हम रहना सीखले हर हाल मेँ ,
तो फिर हर बात बन जाये . . . . .
"जय" शुभ संध्या मित्रोँ. 19/09/१३
वह वाण बन जायेँ ।
अपने को इतना नरम ना करो ,
की वह छुई मुई का पेड़ बन जायेँ . . . . .
आग है तेरे दिल मेँ , मेरे दिल मेँ ,
और उसके दिल मेँ ,
इस आग को योँ ना भड़काओ कि उसमे ,
जलकर राख बन जायेँ . . . .
स्वर बिखरे पड़े हैँ प्रकृति मेँ ,
उन्हे खोजना है ,
उनको योँ जोड़ेँ ,
कि वह राग बन जायेँ . . . . .
मुश्किल लाख सही क्या होता है ,
हम रहना सीखले हर हाल मेँ ,
तो फिर हर बात बन जाये . . . . .
"जय" शुभ संध्या मित्रोँ. 19/09/१३
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