Tuesday, 5 November 2013

बारुद के ढ़ेर पर

बारुद के ढ़ेर पर ,
बैठा है इंसान . . .
फिर भी एक दूसरे से ,
ऐँठा है इंसान . . .
चाल चले काल की ,
चाहे अमरता ,
नाम राम का रावण के ,
काम करता ,
किसी ने ना समझा ,
जाने कैँसा है इंसान . . .
तन का पतंगा उड़कर ,
जाता आकाश ,
जलकर खुद ही ,
खुद को करता प्रकाश ,
फिर भी मैँ मैँ क्योँ ,
करता है इंसान . . .
आज की रौनक ,
कल फिर अधेँरा ,
हमने ही जाल से ,
बनाया है घेरा ,
फिर भी अपने ज्ञानगुन ,
गाता है इंसान . . .
"जय" २५/१० /२०१३ 

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