Tuesday, 5 November 2013

साँझ ना देखी जिसने ,

साँझ ना देखी जिसने ,
वो भोर को क्या जाने . . .
पतझड़ ना देखा जिसने ,  
वो बसंत को क्या माने . . .
  
सुख दुख की छाँव धूप ,  
रात दिन का जोड़ा खूब , 
श्याम श्वेत के रंग निराले ,
जो जीवन के रंग ना जाने ,
वो जीवन को क्या माने . . .
  
अंधेरो की राह जब तक ,
रोशनी की महफिल तब तक ,
कुछ अच्छा कुछ बुरा यहाँ ,  
जो असत्य को ना पहचाने,
वो सत्य को कैसे माने . . .
 
ऊपर नीचे धरती आकाश ,
आंगे पीछे और दूर पास ,
ज्ञान अज्ञान साथ रहते ,
अपनी अपनी भाषा कहते ,
जिसे निशा का आभाष नहीँ ,
वह दिन को क्या माने . . .
 

"जय "

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