Friday, 22 November 2013

आदमी

ना जाने यह कैँसा है आदमी . .
आशा ये मीठे फलोँ की करता ,
बीज बबूल के बोता है आदमी . .

दूसरोँ को हर वक्त पीड़ित करता ,
अपनो को अपने से पराया करता ,
फिर आशा सुख की करता है आदमी . .

मात पिता की सेवा की नहीँ कभी ,
जीते जी जिन्हे निवाले को तरसाया ,
फिर सालोँ श्राध्द करता है आदमी . .

खुदकी फितरत को ना पड़ता ,
खुदकी हरकतो से ना भिड़ता ,
जहां की फितरत वयां करता है आदमी . .

राम की कहता रावण की सुनता ,
गंगाजल की बातेँ जाम से मिलता,
क्या क्या यहाँ करता है आदमी . .

स्नेह के आंगन मेँ जहरीले बीज ,
करता पार यहाँ ये प्रेम की दहलीज ,
भरोसे की कलियाँ तोड़ता है आदमी . .

सभी के घावोँ पर नमक छिड़कता रहा ,
किसी की मजबूरी पर ना आई दया ,
फिर अपने दर्द मेँ अकेला रोता है आदमी . . .

"जय" 16/11/2013

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