Thursday, 28 November 2013

मेरे जज्बात

उनको सजाना था अपना घर बेशक सजाते ,
मेरा असियाना जलाने की जरुरत क्या थी ।

उनको बहलाना था दिल बेशक बहलाते ,
मेरे जज्बातोँ से खेलने की जरुरत क्या थी ।

हर बार मुझे अपने तीरोँ से घायल किया ,
मार चुके हो तड़पाने की जरुरत क्या थी ।

जब तोड़ ही दिये तूने सारे दिल के रिस्ते ,
फिर जनाजे पर आने की जरुरत क्या थी ।

सिर्फ मौत ही तो मुझसे मिलती रही रोज ,
खुली आंखे बंद करने की जरुरत क्या थी ।

"जय कुमार" 27/11/2013

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