हम अपना एक अनुभव आप के साथ शेयर कर रहे हैँ ! 13 oct , रात लगभग 9.0 बजे , हम अलमारी से अपनी पुस्तकोँ को निकाल रहे थे , हम देखते हैँ कि पुस्तकेँ कटी हुईँ है , हम पुस्तको को उठाते जाते है , फिर देखते है की पुस्तकोँ के पीछे कागज के टुकड़ो का ढ़ेर लगा है , तथा वह कागज हिल रहेँ है , हम कागज को हटाते है , तो वहाँ नवजात छोटे छोटे चूहे के 10 -12 बच्चे जिनकी आँखे भी बंद हैँ बैठे हुए है , तथा रोशनी को देखकर बैचेन हो गये है , फिर हम सोचने लगेँ , अब क्या किया जाये , हमने सोचा की अगर इन बच्चो को बाहर छोड़ेगे तो यह काल के मुह मेँ अभी चले जायेँगेँ , अगर यहीँ छोड़ते है तो बड़े होकर , और पुस्तको को नुकशान पुहुचायेँगेँ , 10 मिनिट सोचने के बाद , निर्णय लिया की इन बच्चोँ को बड़ा हो जाने दो , उसके बाद पिंजरे मेँ कैद कर बाहर , छोड़ देँगे , जब तक यह जीवन जीना सीख लेँगे , यही सोचकर उन्हे ढाँक दिया ! दूसरे दिन हमने देखा कि वहाँ एक भी बच्चा नही था , अब हम अचरज मेँ थे , कि आखिर बच्चे कहाँ गये , हमेँ समझ मेँ आया कि रात मेँ , उनकी माँ ने खतरा भांप लिया है , बच्चोँ को सुरक्षित स्थान पर ले गई है , हमने उस माँ की ममता को समझा और भावुक हो गये ! एक तरफ जहाँ इंसान अपने बच्चो को गटर मेँ फेँकने से भी नही चूकता , दूसरी तरफ इन जीवोँ की ममता देख आँखे भर आयीँ !
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