मेरे भाव
जोगी उतर गया ,
अब तेरा जोग ।
शर्मिँदा आज संत ,
देखकर तेरा भोग ।।
"जय" 31 /08/2013
वतन की शान
वतन की शान शौकत ,
कम होने ना देँगे ।
दुश्मनो को देश के ,
आँगे होने ना देँगे . . .
जहर देश की फिजाओँ मैँ ,
तुम घोल ना पाओगे ,
नफरत के बीजो को ,
अंकुरित होने ना देँगे . . .
मुशकिले आये चाहे आये तूफान ,
अपने वतन के पत्तोँ को ,
हिलने ना देँगे . . .
मुश्किल से सँभाला है ,
हमने चैनो अमन को ,
योँ खाक मैँ मिलने ना देँगे . . .
दुश्मनी बैठा रखी है ,
तुने अपने दिल मैँ ,
क्योँ बार पीछे से करता ?
हम अपने वीरो को ,
योँ शहीद होने ना देँगे....... "जय"
मेरे भाव
जोगी भोगोँ मेँ फँसे ,करते काले काम ।
अब किसको झूठा कहेँ ,
बताओ आसाराम . . .
सारा जग शर्मिँदा है ,
सुनकर तुमरे काम ।
कैसेँ समझा सकेँ , मेरे भाव
समझाओ आसाराम . . .
वासनाओँ मेँ पड़कर ,
भूल गये तुम श्याम ।
विट्ठल्ला अब पूँछ रहे ,
बताओ आसाराम . . .
अपने ओछे काम से ,
तुम धर्म करो बदनाम ।
आज सब पूँछ रहे ,
सुनाओ आसाराम . . .
यह किसके है आश्रम ,
इनमेँ किसका दाम ।
पूँछे अब भक्त तुमारे
समझाओ आसाराम . . . . .
"जय" २/०९/१३
मेरे भाव
ख्यालात को भी अपने ,महफूज रखो ,
इस जमाने मेँ ,
क्या नही लुटता दोस्त ? . . .
"जय" ०३/०९/१३
मंदिर मस्जिद् बहुत वन गये ,
अब मानवता का एक घर ,
बनाना होगा . . . .
जिसमेँ ना रह पाये कोई धर्म ,
इसमेँ सिर्फ मानव को ,
रहना होगा . . . .
मिट जाएँ सब भेद भाव ,
जात क्षैत्र का भाव मिटे ,
ऊँच नीच की बात ना होवे ,
रंग रुप का भेद मिटे ,
ऐँसा एक दीपक ,
जलाना होगा . . . .
"जय" ०५/०९/१३
मेरे भाव
अँधेरा होने से पहले ,ज्ञान का दीपक जला लेना ।
वक्त रहते अपने आप से ,
मुलाकात कर लेना . . . .
मुशकिल से मिला है ,
कुछ करने का मौका ,
अपनी हिम्मत को ,
एक बार अजमा लेना . . . . .
तन मन की हैँ भ्राँतियाँ ,
असफल सफल के सवाल ,
साँस रहते हुए ,
मैँ और मुझमैँ के ,
अंतर को पहचान लेना . . .
"जय"०६/०६/१३
मेरे भाव
एक दिन कुछ ऐसा हुआ ,
मैँने अपने मन को छुआ ।
मन कहने लगा तुम क्योँ ,
दौर के साथ नही चलते ,
योँ ख्वाबो की दुनिया ,
मैँ क्योँ मचलते ।
यहाँ सब ऐसा ही चलता है ,
बच्चा शेर का ,
कुत्तो के पास पलता है ।
मँदिर मेँ आ गये तो ,
प्रसाद तो चढ़ाना ही होगा ,
यहाँ के भगवान अब मँदिरोँ मेँ कम ,
कार्यालय मेँ ज्यादा वसते है ,
मुराद पूरी करना है ,
मेँवा तो चढ़ाने ही होगेँ ।
मैँने भी जवाब दे दिया ,
और उससे साफ कह दिया ।
हमारे ख्वाबो मेँ भविष्य छिपा है ,
हमने अपनी किस्मत को खुद लिखा है ।
कहदो अपने काजगो के देवताओ से ,
अब दौर बदलने वाला है ,
अपना ईमान बदलले ,
रात के पहर खत्म हुए ,
अब आशाओ का सूरज उगने वाला है . . .
"जय" ०७ /०९ /१३
मैँने अपने मन को छुआ ।
मन कहने लगा तुम क्योँ ,
दौर के साथ नही चलते ,
योँ ख्वाबो की दुनिया ,
मैँ क्योँ मचलते ।
यहाँ सब ऐसा ही चलता है ,
बच्चा शेर का ,
कुत्तो के पास पलता है ।
मँदिर मेँ आ गये तो ,
प्रसाद तो चढ़ाना ही होगा ,
यहाँ के भगवान अब मँदिरोँ मेँ कम ,
कार्यालय मेँ ज्यादा वसते है ,
मुराद पूरी करना है ,
मेँवा तो चढ़ाने ही होगेँ ।
मैँने भी जवाब दे दिया ,
और उससे साफ कह दिया ।
हमारे ख्वाबो मेँ भविष्य छिपा है ,
हमने अपनी किस्मत को खुद लिखा है ।
कहदो अपने काजगो के देवताओ से ,
अब दौर बदलने वाला है ,
अपना ईमान बदलले ,
रात के पहर खत्म हुए ,
अब आशाओ का सूरज उगने वाला है . . .
"जय" ०७ /०९ /१३
मेरे भाव
आसाराम के काम पर ,हंसते आज महंत ।
कुछ की बाते छिपी पड़ी ,
वो आज भी संत . . .
जिनकी बाते निकल पड़ी ,
वो बहरुपिया ,
सफेद कपड़ोँ के तले ,
कुछ करते काले काम ,
ऐँसे और भी होँगे संत . . . .
लोगोँ का भरोशा उठा ,
क्योँ तुले हो आस्था का ,
करने को तुम अंत . . . .
हमेँ धर्म के ठेकेदारो से ,
धर्म मुक्त करना होगा ,
हम अपनी संस्कृति को ,
बदनाम ना होने देँगे ,
जिसका कोई आदि ना अंत . . .
"जय" ११ /०९ /०३
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