Tuesday, 5 November 2013

पाखण्ड

वेरंग कर दिया तूने , 
मेरी जिँदगी को , 
शर्मसार कर दिया तूने , 
मेरी बंदगी को . . . .
भरोसा शब्द से ही डरने लगे , 
अपना अक्श ही डरा जाता है , 
परछाई देख ही सहम जाते हैँ , 
काँटो से भर दिया तूने ,               
मेरी जिंदगी को . . . .
तुम व्यापार धर्म का करते हो , 
ईश्वर का सेवक बनकर के , 
आस्था ने ईश्वर बना डाला तुमे , 
जिसको मैँने पूजा ह्रदय से , 
उसने ही डस लिया , मेरी बंदगी को . . . .
अब भरोसा उठ गया है , 
इन डँकोशली बातोँ से , 
मैँ प्रेरणा बन जाऊँगी , 
इस जमाने की हर बेटी की , 
तुमसा कोई अब पाखंडी , 
अब लूट ना पायेगा , 
मेरी अस्मत को . . . .
"जय" 11/09/2013


क्योँ चिल्लाते रहते हो ,
भोँपू की तरह , 
कभी अपने आप मेँ भी , 
झाँक लिया कर , 
एक वार फिर , 
शून्य मेँ जाकर , 
कभी उससे मिल , 
जिसके लिये तू बना है , 
वहाँ से फिर यात्रा शुरु कर , 
अनन्त की , 
अनन्त की . . .

"जय" 12/09/2013


फाँसी नहीँ सरेआम सजा , अब मिलनी चाहिए । 
सदियोँ से जमीँ हुई बर्फ , अब पिगलनी चाहिए ।। 

"जय" 13/09/13


जिंदगी छोटी है , 
हर बात बड़ी । 
हर मोड़ पर , 
एक बात खड़ी । 
चलना ही इंसा का काम है , 
यहाँ चलता है , 
वह हर घड़ी । । 

"जय". . 13/09/2013


हिन्दी भारत के जीवंत प्राण हैँ ,
हर भारतीय की अमिट पहचान है . . . . 
भारत का ह्रदय हिन्दी की गोद मैँ वसता , 
इसमेँ सब भाषाओँ का रुप पनपता , 
भारत माँ का चंदन बनकर , 
यह तो भारत की शान है . . . .
वह निश्प्राण हो चुके हैँ , 
मुद्रा मेँ जो बिक चुके है , 
मातृ भाषा को छोड़कर , 
जिन्हे विदेशी भाषाओँ पर अभिमान है . . . .
लेँ प्रतिज्ञा इस अवसर पर , 
अब भारत का हर नागरिक , 
हिन्दी को अपना हक दिलवायेगेँ , 
इस भाषा की प्रतिष्ठा को बढ़ायेगेँ , 
यही हिन्दी का सच्चा सम्मान है . . . .

"जय" 
 14/09/2013


जिँदगी क्या है , 
यहाँ कोई कहाँ समजा है . . . 
जिसने जिँदगी को समजा , 
वह इस पर हँसा है . . . . 
कभी सामने गिरती बूँद को देखो , 
क्या हस्र होता है उसका , 
क्योँ गफलत जीता है , 
यहाँ तू जँजीरो मेँ फँसा है . . . .
जीता रहा तू हर वक्त अहम् मेँ , 
वक्त की चाल ना समझा तू , 
जब बक्त खत्म होता रहा , 
तब तू खुद पर रोया है . . . . 
उस बक्त हिसाब किया तूने , 
जब साँसे खत्म हो चली , 
जिँदगी से क्या पाया , 
और क्या खोया है . . . . 
इतिहास गवाह है , 
खोलकर देख ले , 
मगरुर ना हो जीवन मेँ , 
यहाँ सदा कौन रहा है . . . . 

"जय"  15/09/13


चेहरा ही जीवन का , बखान कर जाता है । 
मुझे अपना अक्स ही , परेशान कर जाता है । । 

"जय 15/09/13



यह राजस्थान की भूमि ,
पालन करती वीरोँ का । 
यहाँ पनपती है संस्कृति , 
जो सृजन करती हीरोँ का . . . . . . 
पग पग पर महल कोठरी , 
जन जन मेँ वसी वीरता , 
इतिहास अधूरा हो जायेगा , 
इस भूमि के वीरोँ के बिन , 
मरुभूमि नित वंदन करती वीरोँ का . . . . 
पृथ्वीराज से योध्दाओँ ने , 
इस धरा को खून से सीँचा था , 
राणा साँगा की वो तलवारेँ , 
अमर अमिट जीवन करती , 
लोहा लिया था जिनने , 
अन्याय की जंजीरोँ का . . . . . . . 
उस राजपूतानी पन्ना को , 
इतिहास भुला ना पायेगा , 
जब जब वलिदान की बात आयेगी , 
पन्ना माँ का नाम दुहरायेगा , 
जिसने ममता का गला घोँट , 
सामना किया था , 
वक्त की लकीरोँ का . . . . . . .
महाराणा प्रताप की भुजाओँ ने , 
जब अपनी हिम्मत दिखलाई थी , 
अकबर भी कांप उठा था , 
राज भक्त की भक्ति देख , 
मुगल सेना भी शरमाई थी , 
झुकना जिसने उचित ना समझा , 
वन वन घूमे , भेष रखा फकीरोँ का . . . . . 
यह राजस्थान की धरती , 
वीरोँ की जहाँ फसल उपजती , 
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . 

जय" यह छोटा सा प्रयास हमारे राजस्थान को समर्पित है . .  16/09/2013



जोगी तेरे जोग ने , यह कैँसा लगाया रोग । 
राजनीति तो सीख गये , सीखन आये थे योग ।। 
योग कहाँ रहा , अब राजनीति मेँ छाय । 
योग सीखन जो गया , राजनीतिज्ञ बनकर आय ।। 

"जय" 17/09/13



No comments:

Post a Comment